सूर्य किरण चिकित्सा – Sun ray treatment

सूर्य किरण चिकित्सा

हमारा शरीर पाँच महाभूत तत्वों से बना है. ये हैं- आकाश, वायु, अग्नि, जल ओर धरती| जब मानव ने जन्म लिया तो उन पाँच तत्वों मे विकार के कारण जो तत्व क्रमश: उत्पन्न होते गये उनमें से प्रत्येक तत्व अपने से पहले उत्पन्न तत्वों की तुलना मे स्थूल थे, जैसे- सूक्षतम भगवान से आकाश स्थूल है, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल ओर जल से धरती स्थूल है| इन पाँच तत्वों को मिलाकर मानव के स्थूल शरीर का निर्माण हुआ है| इस कारण पंच तत्व निर्मित हमारे शरीर की रक्षा व स्वास्थ केवल भोजन से संभव नहीं है बल्कि इसके लिए पाँचों तत्वों की ज़रूरत है अथार्थ पाँच तत्व हामरे शरीर के लिया पाँच भोजन की तरह है| इन भोजनों में से किसी की भी कमी होने पर शरीर रोगी हो जाता है| उस समय हम जिस तत्व की कमी से रोग हुआ है उस तत्व से बुद्धिमानी की साथ इलाज के रूप में काम लेकर लाभ प्राप्त कर सकते है| हम आपको पाँच तत्व मे से अग्नि तत्व के बारें मे जानकारी देंगे व उसके द्वारा चिकित्सा कैसे की जाती है ये बताएँगे|

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अग्नि पाँच तत्वों में से तीसरा उपयोगी तत्व है, परंतु द्रश्य तत्वों में से प्रथम है| अग्नि तत्व द्वारा चिकित्सा सूर्य के द्वारा की जाती है| सूर्य समस्त खगोल मंडल में सबसे बड़ा है| सूर्य किरण के धरती पेर आने में जब कोई रुकावट आती है तो उस समय इंसानी शरीर में रोग बढ़ जाते है| जैसे – सूर्य प्रकाश के धरती पर आते समय यदि उसके मार्ग में मंगल ग्रह आ जाए तो उस समय धरती के उस भाग मे रहने वाले प्राणी गर्मी से उत्पन्न होने वाले रोगों, जैसे – हैजा, चेचक आदि से ग्रसित हो जाते है ओर जब सूर्य की लाल किरण अधिक मात्रा में एक ही जगह पर इकट्ठी हो जाए तो भूकंप आते है|

अब हम सूर्य के सातों रंगो की चिकित्सा के बारें में जानेगें|

1. लाल किरण: सूर्य रश्मि पूंज में 80% केवल लाल किरण होती है| ये गर्मी की किरण होती है, जिनको हमारे चर्म भाग 80% सोख लेते है| स्नायु मंडल को उत्तेजित करना इनका विशेष काम है| लाल रंग गर्मी बढ़ता है व शरीर की निर्जीव भाग को चैतन्यता प्रदान करने में बेस्ट है| शरीर के किसी भाग मे यदि गति ना हो तो उस भाग पर लाल रंग डालने से उसमें चैतन्यता आ जाती है| लाल रंग से जोड़ों का दर्द, सर्दी का दर्द, सूजन, मोच, गठिया आदि रोगों मे लाभ मिलता है| जिसकी पगतली ठंडी हो तो उसे लाल रंग के मोजे पहनने चाहिए| शरीर में लाल रंग की कमी से सुस्ती अधिक होती है| नींद ज़्यादा आती है पर भूख कम हो जाती है| सूर्य तप्त लाल रंग के जल व तेल से मालिश करने से गठिया व किसी प्रकार का बाल रोग नहीं होता है| सूर्य तप्त लाल रंग के जल से फोड़े फुंसी धोएँ तो लाभ मिलता है|

विशेष सावधानी
1. जिस कमरे मे लाल रंग का पेंट किया हो वहाँ भोजन ना करें| लाल रंग का टेबल कवर बिछा कर भोजन ना करें; इससे पाचन बिगड़ जाता है|
2. केवल लाल रंग का सूर्य तप्त जल थोड़ा सा ही पिएं, ज़्यादा पीने से उल्टी व दस्त होने का दर रहता है|

२. नारंगी किरण: यह रंग भी गर्मी बढ़ता है| यह रंग दमा रोग के लिए रामबाण है| दमा, ते बी., प्लीहा का बढ़ना, आँतो की शिथिलता आदि रोगो मे नारंगी किरण तप्त जल 50 सी. सी. दिन में दो बार देने से लाभ मिलता है| लकवे मे नारंगी किरण तप्त तेल से मालिश करने से लाभ मिलता है|

3. पीली किरण: पीला रंग बुद्धि, विवेक व ज्ञान की व्राद्धि करने वाला है| ऋषि मुनि इसी कारण पीले कपड़े पहनते थे| पेट मे गड़बड़, विकार, क्रमी रोग, पेट फूलना, कब्ज, अपच आदि रोगों में पीली किरण द्वारा सूर्य तप्त जल देने से लाभ मिलता है| पानी की मात्रा 50 सी. सी. दिन में २ बार दें|

4. हरी किरण: इसका स्वभाव मीडियू है| यह रंग आँख व त्वचा के रोगो में विशेष लाभकारी है| यह रंग भूख बढ़ाता है| हरा रंग दिमाग़ की गर्मी शांत करने व आँखो की ज्योति बढ़ाने मे रामबाण है| समय से पहले ही सफेद बलों मे अगर हरी किरण द्वारा सूर्य तप्त तेल से मालिश करें तो बाल सफेद नही होते है| सिर व पाँव मे मालिश करने से नेत्र रोग नहीं होते है व नींद अच्छी आती है| कान के रोगों मे हरे तेल की 4-5 बूंदे कन में डालने से लाभ होता है| जिन्हें खुजली हो, फोड़े फुंसी हो उन्हे हरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए|

5. आसमानी किरण: इनमे चुंबकीय व विद्युत शक्ति होती है| यह सब रंगो मे बेस्ट रंग है| यह रंग शांति प्रदान करता है| भगवान राम व कृष्णा भी यही रंग लिए हुए थे| आसमानी रंग जितना हल्का होता है उतना ही अच्छा होता है| टॉन्सिल या गले के रोग में आसमानी रंग का सूर्य तप्त जल दिन में 50 सी. सी. दो बार देने से लाभ मिलता है| अस्थि रोग या गठिया में इस जल से भीगी पट्टियाँ बाँधे तो लाभ होगा| इस रंग के तेल की मालिश से शरीर मजबूत व सुंदर बनता है| स्वस्थ मानव भी अगर यह जल पिए तो टॉनिक का काम करता है| मधुमक्खी, बिच्छू के काटने पर उस स्थान को आसमानी रंग से धोएँ तो लाभ होगा| शरीर में सूजन हो तो आसमानी रंग के कपड़े पहनें|

6. नीली किरण: इस रंग की कमी से पेट मे मरोड़, आन्त्रसोध व बुखार होता है| इसमे नीली किरण का सूर्य तप्त जल 50 सी. सी. दिन मे दो बार दें, लाभ होगा| फोड़े फुंसी को इस जल से ढोने पर उनमे पस नही पड़ता है| इस जल से कुल्ले करने पेर टॉन्सिल व छालों मे लाभ मिलता है| इस रंग के तेल से सिर में मालिश करने पर बाल काले व मुलायम बनते है| सिर दर्द नहीं होता है ओर दिमाग़ को ताक़त मिलती है| स्मरण शक्ति तेज होती है|

7. बैंगनी किरण: यह शीतल होती है| इस रंग की कमी से शरीर मे गर्मी बढ़ जाती है| हैजा, हल्का ज्वर व परेशानी रहती है| बैंगनी किरण से बना सूर्य तप्त जल रैबीज के रोगी को 50 सी. सी. दिन मे २ बार देने से लाभ मिलता है| टी. बी. के रोगी को भी इस जल से लाभ मिलता है| नीली किरण वाले जल से बुद्धि बढ़ती है, दिमाग़ शांत रहता है| शरीर में इस रंग से बने तेल की मालिश से नींद अच्छी आती है व थकान दूर होती है|

अब हम आपको सूर्य द्वारा किस तरह पानी व तेल बनाया जाता है उसकी जानकारी देंगे|
सूर्य किरण चिकित्सा प्रायः चार माध्यमों से की जाती है-
1. पानी द्वारा भीतरी प्रयोग
2. तेल द्वारा बाहरी प्रयोग
3. सांस द्वारा
4. सीधे ही किरण द्वारा

सूर्य की किरण मे सात रंग होते है किंतु मूल रंग तीन ही होते है|
१. लाल 2. पीला 3. नीला

सूर्य चिकित्सा इन्ही रंगो की सहायता से की जाती है-
1. नारंगी (लाल, पीला, नारंगी में से एक)
२. हरा रंग
3. नीला (नीला, आसमानी, बैंगनी में से एक)

सूर्य तप्त जल तैयार करने की विधि

साफ काँच की बोतल में साफ ताज़ा जल भरकर लकड़ी के कार्क से बंद करदें| बोतल का मुँह बंद करने के बाद उसे लकड़ी के पट्टे पर रखकर धूप मे रखें| 6-7 घंटे बाद सूर्य की किरण के प्रभाव से सूर्य तप्त होकर पानी दवा बन जाता है ओर रोग निरोधक तत्वों से युक्त हो जाता है| चाहें तो अलग अलग की बोतल मे पानी बनाएँ पर ध्यान रहें की एक रंग की बोतल की छाया दूसरे रंग की बोतल पर ना पड़े|
धूप मे रखी बोतल गरम हो जाने से उसमे खाली भाग पर भाप के बिंदु या बुलबुले दिखने लगे तो समझ जाएँ की पानी दवा के रूप में उपयोग के लिए तैयार है| धूप जाने से पहले लकड़ी के पट्टे सहित उसे घर मे सही जगह पर रख दें व सूर्य तप्त जल को अपने आप ठंडा होने दें| यह पानी तीन दिन तक काम में लिया जा सकता है| पुराने रोगों में पानी की खुराक 25 सी. सी. दिन मे तीन बार लें| तेज रोगों में 25 सी. सी. दो दो घंटे के बाद से बुखार, हैजा मे 25 सी. सी. १/२ घंटे के अंतराल से देना चाहिए| नारंगी रंग की बोतल का पानी नाश्ते या भोजन के 15 मिनिट बाद लेना चाहिए| नीले व हारे रंग का पानी खाली पेट लेना चाहिए, क्योकि इसका काम शरीर मे जमा गंदगी बाहर निकलना व खून साफ करना है|
यदि आप टॉनिक के रूप में सूर्य तप्त जल पीना चाहते है तो उसे सफेद काँच की बोतल में भरकर बनाएँ| इस पानी से बाल धोने से चमक पैदा होती है व बाल टूटते नही है|

सूर्य तप्त तेल तैयार करने की विधि

जिस रंग का तेल तैयार करना हो उस रंग की बोतल को साफ करके उसमे नारियल या सरसों का तेल ३/४ भाग तक भर दें| अब कस कर कॉर्क लगा दें| लकड़ी के पट्टे पर बोतल रखें| रोज ६-७ घंटे तेज धूप में रखें| बोतल को बाहर से रोजाना साफ कपड़े से पोंछे| तेल मे आप एक चम्मच अजवाइन डाल सकते हैं| बोतल को रोज दिन मे २ बार हिलाएँ| गर्मियों में ४० दिन में व सर्दियों में ६० दिन तक धूप मे रखने से तेल रोगनाशक व दर्दनाशक दावा का रूप ग्रहण कर लेता है| इस तेल से मालिश करने से त्वचा चमकदार व मुलायम बनती है, हड्डियाँ मजबूत होती है, गठिया जहा हो वहाँ इस तेल की मालिश से बहुत लाभ मिलता है| लाल रंग की बोतल का तेल मालिश की लिए सबसे अच्छा होता है व हारे रंग की बोतल का तेल दिमाग़ व बालों के लिए उत्तम होता है| जिस दिन तेल से मालिश करें उस दिन साबुन का प्रयोग ना करें| सप्ताह में २ बार मालिश करनी चाहिएं|
ध्यान देने वाली बातें
१. हमेशा काँच की बोतल का ही प्रयोग करें, प्लास्टिक का नहीं|
२. बोतल पर कॉर्क लकड़ी का लगाएँ|
३. जिस रंग का पानी या तेल तैयार करना हो उसी रंग की बोतल का प्रयोग करें|
४. यदि रंगीन बोतल ना हो तो सफेद रंग की बोतल पर इच्छित रंग का सलोफेन कागज लपेट दें व धागे से बाँध दें| कागज का रंग फीका पड़ने पर कागज बदल दें|
५. बोतल को पहले पानी मे ऊबाल लें व अकचे से पुंछ लें| बोतल पेर किसी तरह का कोई दूसरा कागज चिपका नहीं होना चाहिए|
६. बोतल को ज़मीन पर कभी ना रखें| इसे लकड़ी के पट्टे पर ही रखें|
७. सुबह ७ बजे से शाम ५ बजे तक बोतल को पट्टे सहित बाहर धूप में रखें|
8. पानी ८ घंटे मे तैयार हो जाता है जिसका असर ३ दिन तक रहता है|
९. तेल ४० दिनों मे तैयार होता है व ६ महीने तक उसका असर रहता है| उसके बाद फिर से धूप मे रखने से असर शुरू हो जाता है|
10. बोतल को कभी भी ३/४ से अधिक नही भरना चाहिए| बोतल को कभी भी कपड़े से ढक कर नही रखें|